वैदिक अंक ज्योतिष
वैदिक अंक ज्योतिष दो अंकों के साथ काम करता है: मूलांक, जो जन्म के दिन से निकलता है, और भाग्यांक, जो पूरी जन्म तिथि से। हर अंक भारतीय ज्योतिष के किसी एक ग्रह से जुड़ा है।
गणना कैसे करें
मूलांक — जन्म के दिन को घटाकर निकला अंक। 14 तारीख़ के लिए: 1+4 = 5। यह बताता है कि इंसान ख़ुद को कैसे देखता है, और 35 वर्ष की उम्र तक सबसे ज़्यादा असर रखता है।
भाग्यांक — तिथि के सभी अंकों का योग। 14.02.1988 के लिए: 1+4+0+2+1+9+8+8 = 33 → 6। यह बताता है कि दूसरे इंसान को कैसे देखते हैं, और जीवन के दूसरे हिस्से में मज़बूत होता है।
दोनों अंकों के अंतर को आत्म-छवि और प्रतिष्ठा के बीच के फ़र्क़ के रूप में पढ़ा जाता है।
अंक और ग्रह
| अंक | ग्रह | गुण |
|---|---|---|
| 1 | सूर्य | इच्छाशक्ति, नेतृत्व |
| 2 | चंद्रमा | संवेदनशीलता, परिवर्तनशीलता |
| 3 | बृहस्पति | ज्ञान, विस्तार |
| 4 | राहु | लीक से हटकर, अप्रत्याशितता |
| 5 | बुध | बुद्धि, संवाद, व्यापार |
| 6 | शुक्र | सौंदर्य, आराम, प्रेम |
| 7 | केतु | वैराग्य, रहस्यवाद |
| 8 | शनि | परिश्रम, बंधन, अनुशासन |
| 9 | मंगल | ऊर्जा, संघर्ष |
यहाँ ग्रहों का संबंध पश्चिमी पद्धति से मेल नहीं खाता: चार और सात चंद्र नोड राहु और केतु को दिए गए हैं, जो यूरोपीय अंक ज्योतिष में होते ही नहीं।
पश्चिमी पद्धति से क्या अंतर है
तीन अंतर हैं। पहला — ग्रहों का संबंध, जिसकी बात ऊपर हुई। दूसरा — मास्टर अंकों का न होना: 11, 22 और 33 को बिना किसी अपवाद के घटाया जाता है। तीसरा — वैदिक ज्योतिष से जुड़ाव: वैदिक अंक ज्योतिष अपने आप में नहीं, बल्कि जन्म कुंडली के पूरक के रूप में इस्तेमाल होता है।
एक अलग पद्धति भी है — कटपयादि, जिसमें अंकों को संस्कृत अक्षरों से कूटबद्ध किया जाता है। इसका उपयोग खगोलीय स्थिरांकों को श्लोकों में याद रखने के लिए होता था, और नाम के अंक ज्योतिष से इसका कोई लेना-देना नहीं है।